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चित्तौड़ की दहाड़ (राजस्थान पर्यटन सीरीज पार्ट 3)

#पर्यटन_सीरीज
#तृतीय

झीलों की नगरी से अबकी चलते हैं सबसे ऐतिहासिक जगह ''चित्तौड़गढ़'' ,चित रोड यानि रोडो का गढ़ ,पांडवों के समय से बसा ये शहर अपने आप में अद्भुतता लिए हैं,कइयों ने तो तीर्थ से बढ़कर माना है,कई एकता का प्रतीक बताते हैं,तो इतिहास की पोथी से कुछ पन्ने चुराके पेश करते हैं ..कुछ घुमक्कड़ी और कुछ तथ्य (जब गाइड न लेना हो )...

चित्तौड़गढ़ जंक्शन पर पहुँच 'चित्तौड़गढ़ का किला' देखने निकल जाना,जिसके लिए कहा गया है कि 'चित्तौड़गढ़ तो गढ़ बाकि सब गढ़ैया' ,बीच में 'गंभीरी नदी' का पुल पार करते हुए 'तलहटी' जो कि चित्तौड़ का क़स्बा है से गुजर पहुंचना पहाड़ी पर बने 'चित्तौड़गढ़ के किले' जो कि भारत का सबसे विशाल गढ़ है ,जिसकी चारदीवारी 5 किलोमीटर में फैली हुई है,यहाँ प्रवेश के सात दरवाजे हैं - 'पाडन पोल' ,वही पास चबूतरे पर 'रावत बाघसिंह का स्मारक' देखते हुए 'भैरव पोल' पर दो छतरियां देखना 'जयमल' और 'कल्ला' की ,अब 'हनुमान पोल' और हनुमान मंदिर दर्शन कर,'गणेश पोल'  और 'गणपति मंदिर' से आशीर्वाद ले 'जोड़ला पोल' ,फिर 'लक्ष्मण पोल' और 'लक्ष्मण मंदिर' और अंत में 'राम पोल' पार करके भारतीय स्थापत्य का अनूठा नमूना 'राम मंदिर' चले जाना । अब उत्तर में 'बस्ती' है और दक्षिण में 'दर्शनीय स्थल' ... ' पत्ता सिसोदिया का स्मारक' , 'कुकड़ेश्वर कुंड और मंदिर' , 'हिंगला अहाड़ा महल' , 'रत्नेश्वर महादेव मंदिर और तालाब' , 'लाखोटा की बारी' यहाँ से दुर्ग के नीचे जाने को छोटा दरवाजा है । इतना घूमते घूमते पहुँच जाओगे जैन तीर्थंकर आदिनाथ के बनवाये हुए 'कीर्ति स्तम्भ' ,वही 'महावीर स्वामी मंदिर' ,फिर 'नीलकंठ महादेव मंदिर' । अब पूरब की ओर दरवाजा है 'सूरज पोल' ,यही है 'चूड़ावत साईं दास स्मारक' ,फिर 'अद्भुत मंदिर' महादेव की विशाल अद्भुत मूर्ति है तभी इसका नाम अद्भुत है । अबकी थोड़ा ऊँचा चढ़ना 'राज टीला' फिर वहीं है 'चत्रंग तालाब' ...यहाँ किला एक तरफ से खत्म सा हो जाता है , नीचे छोटी पहाड़ी है 'चित्तौड़ी' उसपर है 'बीका खोह बुर्ज' और एक पास कृत्रिम टीला है 'मोहर मगरी' ...एक सफ़र यही समाप्त करो । एक खास बात और- किले के भीतर झीलें हैं, बाग हैं और शरीफा (सीताफल) के बागान भी। यहां का शरीफा आज भी सारे देश में खाया जाता है।

अब एनर्जी बढ़ा के फिर शुरू करना 'विजय स्तम्भ' या 'विक्ट्री टावर' से जिसे ख़िलजी से जीत पर बनवाया गया था ,यह देवी देवताओं की मूर्तियों के साथ अद्भुत नमूना है ,इसकी ऊपरी मंजिल से गढ़ और शहर दिखाई देता है । पांडवों की अस्तित्वता का भान होगा ,जब देखेंगे 'भीम ताल' , अब चल पड़ेंगे 'बादशाह की बाक्सी' जो मालवा के सुल्तान महमूद को हराने पर बनवायी थी । थोड़ा अंतर से पश्चिम की ओर चलेंगे तो दिखेंगे 'बून्दी,रामपुरा और सलूम्बर' की हवेलियों के खंडहर,वही पास है 'घौड़े दौडाने का बागान' ..अब चलिये 'पद्मिनी महल' जो पानी के बीच है 'जनाना महल' और किनारे पर है 'मर्दाना महल', यहाँ के एक कमरे में एक विशाल दर्पण इस तरह से लगा है कि यहाँ से झील के मध्य बने 'जनाना महल' की सीढ़ियों पर खड़े किसी भी व्यक्ति का स्पष्ट प्रतिबिम्ब दर्पण में नजर आता है, परन्तु पीछे मुड़कर देखने पर सीढ़ी पर खड़े व्यक्ति को नहीं देखा जा सकता। सम्भवतः अलाउद्दीन खिलजी ने यहीं खड़े होकर रानी पद्मिनी का प्रतिबिम्ब देखा था...यही 'पद्मिनी मंदिर' देखना फिर पास में 'मृग वन' है ,अब तालाब के दक्षिणी किनारे पर 'खातन रानी की हवेली' देख ..दक्षिणी पूर्व में दिखेगी 2 गुम्बददार इमारतें ,'गोरा बादल की घूमरें' ..यही से पश्चिम में 'राव रणमल की हवेली' है ..'पद्मिनी महल' के उत्तर में बाई ओर 'कालका जी का मंदिर' मिलेगा जो सम्भवतया सूर्य मंदिर रहा है पर आक्रमण के बाद 'माता जी' की प्राण प्रतिष्ठा की गई ,हर साल वैशाख शुक्ल अष्ठमी को मेला भी लगता है । यही उत्तर पूर्व में 'सूर्य कुंड' और फिर है 'गौमुख कुंड' ..अब निकलते निकलते 'पत्ता जैमल की हवेली' हैं जहाँ तट पर ' बौद्धों के 6 स्तूप' हैं ,और अब देखिएगा 'रानी कर्मावती हाड़ा' का 'जौहर महासती स्थल' ..पास ही 'दो ताल हाथी कुंड' होगा और 'खातण बावड़ी' भी ,फिर राजा भोज द्वारा बनवाया हुआ 'समिध्देश्वर महादेव' देखोगे तो आगे 'जटाशंकर महादेव' ...अब आगे 'कुंभश्याम जी का मंदिर' में पाओगे नागर शैली और मेवाड़ी जीवन शैली पर बनी कला का प्रदर्शन , यहाँ आक्रमण से पहले 'वराहावतार' में भगवान विराजते थे । अब 'भक्त मीराँ बाई मंदिर' में उनकी भक्ति को भी तक लेना ,वही उनके 'गुरु बाबा रैदास जी की छतरी' के दर्शन कर , 'सतबीस देबलां (देवरा) जैन मंदिर देखते हुए निकल जाना...

'कुम्भा महल' की ओर जिसका जीर्णोद्धार 'राणा कुंभा' ने करवाया था ..प्रवेश द्वार 'बड़ी पोल' , 'त्रिपोलिया' से निकल 'सूरज गोरवड़ा' , 'जनाना महल' , 'कँवलदा महल' , 'दीवात - ए -आम' और 'शिव मंदिर' देखना ,कुंभा महल में महसूस करना 'पन्ना धाय का बलिदान' जो उन्होंने अपने बेटे को बनवीर के हाथों मरता छोड़ ' उदयसिंह' को बचाया ,वही 'राजा उदयसिंह' जिन्होंने 'उदयपुर' बसाया , 'मीराँबाई की कृष्ण भक्ति' और 'विषपान' का साक्षी है ये महल । कहते हैं यहाँ से एक सुरंग 'गौमुख' तक जाती है और बीच में तहखाने भी हैं ,वही 'रानी पद्मिनी/पद्मावती' ने 'जौहर' किया था ।

खैर अब 'फ़तेह प्रकाश महल' की बारी आई है और फिर भग्नावस्था में कीमती पत्थरों की गाथा कहता 'मोती बाज़ार' देखते हुए 'सिंगार/श्रृंगार चौरी' से 'साँगा का देवरा' होते हुए 'तुलजा भवानी का मंदिर' दर्शन कर 'गद्दार बनवीर' की महल को दो भागों में करने की कोशिश में बनाई 'अधूरी दीवार' और अपूर्ण बुर्ज 'नवलखा भंडार' देख लेना ,अब 'पातालेश्वर महादेव' देख 'भामाशाह की हवेली' देखना ,जहाँ भामाशाह ने मालवा से लूटा धन रखा और महाराणा प्रताप की हल्दी घाटी में मदद की । वही पास है 'आल्हा कबीर की हवेली' ,अब ढूंढ़ लेना 'पत्ता सिसोदिया की रानी फूल कँवर का जौहर स्थल' और चक्कर लगा आना 'चित्तौड़ के बाजारों' में,जहाँ 'लकड़ी के रंगदार खिलौने' मिलते हैं। 'गंगराई चमड़े की जूतियां' यहां खूब बनती और बिकती है, चित्तौड़ की सौगात है 'सोने की थेवा जूलरी' ,सब झोले में डाल लो और अब अगले दिन के लिए बाहर जाने को तैयार रहना ।

अब ले चलते हैं 9 मील दूर 'नगरी' नामक प्राचीन स्थान जिसे एक जमाने में 'मध्यमिका' भी कहा गया है,चूँकि यहाँ अब सब खंडहर हो चुका है तो खंडहर लवर्स को अच्छा लगेगा ,यहाँ है 'हाथियों का बाड़ा' यहीँ से पत्थर तोड़ 'चतुरस्र मीनार' बनवायी गयी थी,पास है 'ऊमदी वट' और तीन स्तूपों के चिन्ह ,बाकि वर्तमान में भारतीय स्थापत्य कला की मूर्तियां स्थापित है । वापसी पर 'कमला सागर झील' देख आना ,और 'सथिस डोरी मंदिर' भी घूम लेना । 'आर्कियोलॉजिकल संग्रहालय' में घूम घूम इतिहास पढ़ना और आज शाम 'कैसल बिजाईपुर' हेरिटेज हवेली देखना और 35 किलोमीटर पर अति प्रसिद्ध 'सांवलिया सेठ मंदिर' जरूर जा आना । अब 'जयश्री बाण माता' और 'बानूड़ा बालाजी' देखना, फिर 'बल्दरखा' में 'त्रिशूल स्थापना निलिया महादेव' दर्शन कर आना ।

'निम्बाहेड़ा' की सड़के भी नाप आना ।

कुछ मेट्रो सिटी की याद आये तो 'Zero Degree Restro & lounge' , 'Ten 11 Cafe Disk Restro' , 'InBox 09 कैफ़े'  और 'बालाजी रेस्त्रां' घूम आना ।

अब सुबह सुबह निकलना 'बस्सी अभ्यारण्य' , 'सीतामाता अभ्यारण्य' , 'भैंसरोडगढ़ अभ्यारण्य' होते हुए 'नहारगढ़' , टैक्सी करीब एक घंटे में पहुंचाती है। 'नहारगढ़' की खासियत है किला और कुदरती झील के बीचोंबीच 'जस्टा होटल एंड रिजॉर्ट' ,बोट से ही होटल में आते-जाते हैं। सवेरे सूर्योदय का नजारा देखने लायक है। इतिहास की माने तो लिखा है कि 'नहारगढ़ रिजोर्ट' पहले शिकारगाह था। इसे रलावता के 'महाराजा नहार सिंह' ने खरीदा और फिर, उनके बेटे 'राजा जितेन्द्र सिंह राठौड़' ने शिकारगाह को महल में तब्दील कर दिया।

'उदयपुर' से काफी पास है तो वहीं से गाड़ी करके आ जाइये फिर आसपास की जगह और किला गाड़ी में ही घुमिएगा या यहां से गाड़ी ले लिजिएगा ,बाकि गढ़ से लेके हर जगह खंडहरनुमा मिलेगी थोड़ी थोड़ी ,मुसलमानों के आक्रमण के बाद कुछ कुछ हिस्से का ही वापस जीर्णोद्धार हो सका है । कुछ मेवाड़ी,कुछ हिंदी बोलते सुनते घूम लेना जे गढ़ का शहर ।


मेवाड़ बेल्ट में आगे बढ़ते हुए अगले हफ्ते फिर मिलेंगे ,घणी खम्मा

पद्मिनी महल

गणेश पोल

व्यू

विजय स्तम्भ

सांवलिया सेठ

परकोटा

About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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