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राजसमंद के राज गाज (राजस्थान पर्यटन सीरीज पार्ट 4)

#पर्यटन_सीरीज
#चतुर्थ

कुछ पन्ने उदयपुर वाले सीरीज में घुमाएं थे ,कुछ अब घुमिएगा उस एकमात्र जिले के , जिसका नाम झील पर पड़ा और तिलक समान आकृति है ,राजसमंद ।

अब उदयपुर से खूब पास है इसलिए वही से कंटिन्यू करते हैं , 'हल्दीघाटी' महाराणा प्रताप की गाथा सुनाता हुआ,वही मिलेगा 'चेतक स्मारक' और 'महाराणा प्रताप म्यूजियम' ....फिर राजसमंद निकलते हुए 'मैराथन ऑफ़ मेवाड़,विजय स्मारक,दिवेर' देखना ,बहुत ऐतिहासिक जगह है ।

जब 'एकलिंग नाथ जी' जाओगे जिनको 'कैलाशपुरी' के नाम से भी जाना जाता है और दो पहाड़ो के बीच बसा हुआ है ,भोर में उठके निकलना ,तभी सुबह पट बन्द होने से पहले दर्शन हो पाएंगे ,यहाँ से दौड़ लगा लेना विश्व प्रसिद्ध 'श्रीनाथ जी के नाथद्वारा' ,सुबह ही दर्शन कर यहाँ नाश्ता करना ,मंदिर के निकट 'विट्ठलनाथ जी' और 'श्रीहरिराय महाप्रभुजी की बैठक' के दर्शन करना ,फिर जाना 'वनमालीलाल का मंदिर', 'मीरा मंदिर' व 'राधा विलास' । 2 किमी दूर 'लालबाग व संग्रहालय' देखना ,यहीं पास  'गणेश टेकरी' जाना,प्रकृति के नज़ारे बहुत सही है,यहाँ सूर्यास्त बहुत हसीन होता है , उसके आसपास दर्शन होंगे '351' फ़ीट के विश्व के सबसे ऊंचे 'महादेव' के,जो अभी अंडर कंस्ट्रक्शन है । 'रामभोला' में हरियाली अपने अलग ही दौर पर मिलेगी। नाथद्वारा का 'बाजार' भी कुछ कम आकर्षित नहीं करता ,खूब झोले भर ही जाएंगे,यही 'आइकोनिक गेट' भी दिखाई देगा । पास ही 'गणगौर बाग' जा आना,फिर 'कछुवायी बाग़' , यहीं है विलासिता दिखाता 'वल्लभ विलास' ,और देखना 'वल्लभ सम्प्रदाय की पीठ',अब 'महेश टेकरी' देखने निकल जाना और फिर जा आना 12 किमी दूर 'खमभोर' में 'नन्दसमंद बाँध' ।

अब 'गिरिराज पर्वत' की 7 कोसीय परिक्रमा कर लेना ,और थकान उतारने 'रक्त तलाई'  (इसी मैदानी क्षेत्र में महाराणा प्रताप एवं मुगल सेना का युद्ध हुआ और इतना रक्‍त बहा कि इस स्‍थान ने तलाई का रूप ले लिया) चल जाना । फिर 'बाघेरी का नाका' जाना,राजसमंद वालों का नियाग्रा फॉल्स है 😅 ,अब थोड़ा गढ़ भी देख लो 'कोठारिया का गढ़' , फिर 'रकमगढ़ का छापर' ...'हिमाचल सूरी जैन तीर्थ' , आयता की धूणी' , 'मचीन्‍द की धूणी' , 'करधर बावजी' , 'भ्रमराज की धूणी' , 'वाकेराव बावजी मन्दिर मचिन्द' ऐसी छोटी जगहें हैं पर बहुत अच्छी है । 'रामेश्वर महादेव' और 'फरारा महादेव' जरूर जा आना । 15 किमी दूर 'जय भैरूँनाथ बावजी का मन्दिर'  'शिशोदा भागल' में है! शिशोदा में हर तीन साल बाद जय भैरूँनाथ शिशोदा जग महोत्सव होता है ।

अब नाथद्वारा से दूर निकल आओ ...'कांकरोली' या 'राजनगर' में प्रसिद्ध 'द्वारकाधीश मंदिर' देखिये जो अन्नकूट के लिए भी खूब जाना जाता है । यही है 'सिंचाई गार्डन' ,बहुत खूबसूरती से बनाया है । यहाँ सावन में 'मेला' लगा रहता है ।
'गढ़बोर' जाओगे तो 'चारभुजा मंदिर' और 'रोकड़िया हनुमान' पाओगे । चूँकि सब उदयपुर से बहुत पास है तो यही पास है 'जयसमन्द झील' जो एशिया की कृत्रिम मीठे पानी की सबसे बड़ी झीलों में से एक है,यही है 'रूठी रानी का पैलेस' ...अब 'बप्पा रावल' के रहने की जगह को पिकनिक स्पॉट बनाया है तो जरूर घूमना । 'सिहाड़ गाँव' भी अच्छा है । राजसमंद से 77 किमी दूर 'रूपनारायण मंदिर' है और 60 किमी दूर बहुत ही सुंदर 'परशुराम मंदिर' है ,वही 'सूर्य नारायण मंदिर' भी है ।

अब चलते है मुख्य आकर्षण की ओर ... 'राजसमंद झील' अद्भुत ,देख के यही सोचोगे । यही पास ही 'नौ चौकी पाल' है,जहाँ सबसे बड़ी राज प्रशस्ति लिखी है(काले संगमरमर के 25 शिलालेख) है । फिर जाना 'घेवर माता के मंदिर' जो बिना पति के सती हो गई थी । 'गायत्री शक्तिपीठ' ,' अणुव्रत विश्वभारती भवन' भी जाकर आना ।

अब 'दयालशाह का किला' घूमना , 'मांदल' नामक मिट्टी के वाद्ययंत्र भी मिलेंगे ,बजाते हुए कलाकार देखना या बेचते हुए दुकानदार से मिलना,चॉइस आपकी । 'मोलेला गाँव' भी जाना टेराकोटा और मिट्टी की मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है । अब 'केलवा' जाकर 'मार्बल मंडी' देखना । 'रेलमगरा' में 'पछमता गांव' में 'देवनारायण मंदिर' है । 'कुंवारिया' जाकर प्रसिद्ध 'हिंगलाज माता' को पूज आना , फिर 'छापर' वाले 'हनुमान जी' के भी दर्शन करना ।

'आमेट' में 'चंद्रभागा' के किनारे 'वेवर महादेव' देखना । 'लार्ड जयसिंह श्याम जी ' के किनारे सागर , 'रानेराव लेक' ,'सलाम सागर', 'करणी माता बाग' , 'प्रताप सागर'  जैसी सुरमई जगहें भी हैं । 'आमेट पैलेस' और 'वीर पत्ता का चौराहा' जैसी गौरवशाली जगहें भी पूजने लायक है । 'वाडला वावली' और 'शिवनाल और 'शिम माताजी' बहुत प्यारी जगह है ,हो आइएगा । आमेट का नवरात्रि में 'पशु मेला' और 'रंगपंचमी महोत्सव' बहुत प्रसिद्ध है ।

'बनास नदी' और उस पर बने पुल उत्साहित करेंगे ,जिनमें से एक 'गोरम घाट' वहां से रेलगाड़ी गुजरते हुए बहुत हसीन लगती है । 'देवगढ़' का अभ्यारण्य और पैलेस देखने लायक है , 'आंजना केव टेम्पल' भी जरूर जाइएगा । रास्ते में 'देलवाड़ा' का किला बहुत खूब लगेगा ,फिर 'रास देवीगढ़' का हेरिटेज होटल आँखों में भर लेना ,फिर 'लावा सऱदारगढ़' का 'किला' और 'हेरिटेज होटल' मन मोह लेगी ही । 'सेवेन्तरी' का 'लक्ष्मण झूला या गोमती मुहाना' पार करके 'राम सीता मंदिर' जाओगे तब शांति की अनुभूति होगी । 'बृज दर्शन' भी अच्छा ऑप्शन है ,बाकीं 'रिछेड़' में 'आमज माता का मंदिर' है जो ख़ास है ।

अब सबसे ख़ास , 'अजेयगढ़' नाम से जाना जाने वाला 'कुम्भलगढ़' , ये हमेशा 'अजेय' रहा है ,सिवाय जब 'उदयसिंह,मानसिंह और अकबर' ने साथ में हमला किया ।
'महाराणा प्रताप' का जन्म यहीं हुआ था और हल्दीघाटी के युद्ध के समय काफी समय यही बीता था । 'बीकानेर वाले  पृथ्वीराज' , 'राणा सांगा' और 'उदयसिंह' का बचपन यही बीता था । यहाँ का प्रवेश द्वार 'राम पोल' कहलाता है । सात विशाल द्वार,खूब सारे कुएँ और महलों से पूर्ण होते गढ़ की 36 किमी लंबी दीवार है(विश्व की दूसरे नंबर पर सबसे लंबी दीवार) ,जोकि अरावली पहाड़ियों के बीच बीच से निकल रही है । अंदर 'कटारगढ़' है और शीर्ष भाग में 'बादल महल' ,और सबसे ऊपर 'कुंभा महल' है । 'मस्तिष्ककारी महल' में करीब 360 मंदिर है जिनमें 300 जैन मंदिर है और बाकि हिन्दू मंदिर । कुम्भलगढ़ में भीतरी हमला भी हुआ ,जब राणा कुम्भा को उन्ही के बेटे ऊदा सिंह ने राज्यपिपासा में मरवा दिया था । करीब 13 पर्वत शिखरों को घेरता हुआ कुम्भलगढ़ ,विश्व के किलों में विशेष जगह रखता है ,मांड गायकों ने भी कहा है - 'कुम्भलगढ़ कटारगढ़ पाजिज अवलन फेर
संवली मत दे साजना,वंसुज,कुम्भलमेर ।।' ..
यहीं पास है 'हमीरपाल लेक' , ' बावन टेकरी' और 'नीलकंठ महादेव' । फिर 'कुम्भलगढ़ अभ्यारण्य' तो देख ही आना ,'सूरजकुंड धाम' और 'लखेला तालाब' भी प्रफ्फुलित कर देने वाले हैं । कुम्भलगढ़ और राजसमंद के आसपास खूब वाटरफॉल्स मिलेंगे ,देखते चलना ।

अब शहरों की याद आ जाएगी तो 'रासलीला रेस्त्रां' , 'हरियाली रेस्त्रां' जाना ,ज्यादा अमीरी है तो 'लेक अल्पी रिसोर्ट' , 'महुआ बाग' और 'होटल कुम्भा बाग़' ठहरना ।

अब अजमेर और राजसमंद की सीमा पर 'टोडगढ़' बहुत अच्छी जगह है ,'कातरघाटी' देखने लायक है ।

राजसमंद बहुत ज्यादा घूम लिए हो ,आराम करो ,अगली बार इसी बेल्ट में घूमते हुए चलना है । तब तक के लिए राम राम ।।

#घौघड़

हल्दीघाटी

देलवाड़ा पैलेस

राजसमंद झील

कुम्भलगढ़

गणेश टेकरी

कुंभलगढ़

लावा सरदारगढ़
                           
चारभुजा मंदिर,गढ़बोर

लक्ष्मण झूला,सेवेन्तरी

   कातरघाटी,टॉडगढ़
                   
   मैराथन ऑफ़ मेवाड़
                       
बाघेरी का नाका

About Author Mohamed Abu 'l-Gharaniq

when an unknown printer took a galley of type and scrambled it to make a type specimen book. It has survived not only five centuries.

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